Kavara ( A Novel ) - Beetle Book Shop

कवरा ( एक उपन्यास )

Rs. 135.00
बिक्री मूल्य  Rs. 135.00 नियमित मूल्य  Rs. 150.00
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कवरा ( एक उपन्यास )

Rs. 135.00
बिक्री मूल्य  Rs. 135.00 नियमित मूल्य  Rs. 150.00

विक्रेता: BEETLE BOOK SHOP

वायकोम मुहम्मद बशीर, जो एक प्रसिद्ध मलयाली कथाकार हैं, उनकी एक कहानी है 'ओरु मनुष्यन'। उसके अंग्रेजी अनुवाद में एक पंक्ति है,

 'The world is more evil than good.
We realize this only after we get hurt'.

वेंकटरमण गौड़ा के उपन्यास 'कवर' को पढ़ते हुए मुझे बशीर की यह पंक्ति याद आ गई।

यहाँ के पात्र अजीबोगरीब मनोदशा में साँस लेते हुए, दुख सहते हुए और फिर जीते हुए आगे बढ़ते हैं। ऐसा लगता है कि गौड़ा यहाँ यह सच्चाई बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वास्तविक व्यक्तित्व और व्यक्तित्व में पूर्णता एक अस्वाभाविक अवधारणा है।

मनुष्य की खोज का मार्ग अंतहीन है, वह अपने अंदर और बाहर की चीज़ों का रोज़ सामना करता रहता है और अपने अंदर के द्वंद्वों को समझने और उनसे पार पाने की कोशिश करता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है।

यह एक उपन्यास न लगकर कहानी के अंदर कहानी की तरह खुलता है। पात्रों के अंदर के पात्र साकार होकर बातें करते हैं। लेखन की तकनीक में भी नवीनता है। रंगमंच से शुरू होने वाला यह उपन्यास बाद में जीवन के मैदान को ही रंगमंच बना लेता है।

उपन्यास में आने वाला प्रश्न 'क्या एक पात्र का रूपक बनना अपने अंतहीन कष्टों में जलकर मरना है?' पूरे उपन्यास का मूल विषय लगता है।

नागरखा गाँवकर

अतिरिक्त जानकारी

विवरण

वायकोम मुहम्मद बशीर, जो एक प्रसिद्ध मलयाली कथाकार हैं, उनकी एक कहानी है 'ओरु मनुष्यन'। उसके अंग्रेजी अनुवाद में एक पंक्ति है,

 'The world is more evil than good.
We realize this only after we get hurt'.

वेंकटरमण गौड़ा के उपन्यास 'कवर' को पढ़ते हुए मुझे बशीर की यह पंक्ति याद आ गई।

यहाँ के पात्र अजीबोगरीब मनोदशा में साँस लेते हुए, दुख सहते हुए और फिर जीते हुए आगे बढ़ते हैं। ऐसा लगता है कि गौड़ा यहाँ यह सच्चाई बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वास्तविक व्यक्तित्व और व्यक्तित्व में पूर्णता एक अस्वाभाविक अवधारणा है।

मनुष्य की खोज का मार्ग अंतहीन है, वह अपने अंदर और बाहर की चीज़ों का रोज़ सामना करता रहता है और अपने अंदर के द्वंद्वों को समझने और उनसे पार पाने की कोशिश करता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है।

यह एक उपन्यास न लगकर कहानी के अंदर कहानी की तरह खुलता है। पात्रों के अंदर के पात्र साकार होकर बातें करते हैं। लेखन की तकनीक में भी नवीनता है। रंगमंच से शुरू होने वाला यह उपन्यास बाद में जीवन के मैदान को ही रंगमंच बना लेता है।

उपन्यास में आने वाला प्रश्न 'क्या एक पात्र का रूपक बनना अपने अंतहीन कष्टों में जलकर मरना है?' पूरे उपन्यास का मूल विषय लगता है।

नागरखा गाँवकर

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